भारत और शंघाई सहयोग संगठन (SCO)

भारत और शंघाई सहयोग संगठन (SCO)

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 2: शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध।
(खंड-18: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार)

संदर्भ


शुक्रवार को भारत शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का पूर्ण सदस्य बन गया, जिसके प्रवेश की प्रशासनिक प्रक्रिया दो साल पूर्व ही शुरू हो गयी थी। एस.सी.ओ. में भारत की सदस्यता की घोषणा कज़ाखस्तान के राष्ट्रपति नरसुल्तान नज़रबायेव ने की। इसके साथ ही पाकिस्तान को भी इस संगठन का पूर्ण सदस्य बनाया गया।

                                                  शंघाई सहयोग संगठन (SCO)

 

1-शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) एक यूरेशियन राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है, जिसकी स्थापना चीन, कज़ाखस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उजबेकिस्तान के नेताओं द्वारा 15 जून, 2001 को शंघाई (चीन) में की गई थी।

2-उज़्बेकिस्तान को छोड़कर बाकी देश 26 अप्रैल 1996 में स्थापित ‘शंघाई पाँच’ समूह के सदस्य हैं।


भारत के लिए इसका महत्व

संगठन में सदस्यता मिलना भारत के लिए ‘ऐतिहासिक मोड’ साबित हो सकता है। चूंकि संगठन आतंकवाद-विरोधी है, इसलिए भारत को आतंकवाद से निपटने के लिए समन्वित कार्यवाही पर जोर देने तथा क्षेत्र में सुरक्षा एवं रक्षा से जुड़े विषयों पर व्यापक रूप से अपनी बात रखने में आसानी होगी।आज आतंकवाद मानवाधिकारों का सबसे बड़ा दुश्मन है। शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य आतंकवाद को वित्तीय सहायता देने या आतंकवादियों के प्रशिक्षण से निपटने के लिए समन्वित प्रयास करने में सफल हो सकते हैं। ऐसे में आतंकवाद, अलगाववाद और कट्टरता से संघर्ष को लेकर यह संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इस संगठन के अधिकांश देशों में तेल और प्राकृतिक गैस के प्रचुर भंडार हैं। इससे भारत को मध्य-एशिया में प्रमुख गैस एवं तेल अन्वेषण परियोजनाओं तक व्यापक पहुंच मिल सकेगी। यह संगठन पूरे क्षेत्र की समृद्धि के लिए जलवायु परिवर्तन, शिक्षा, कृषि, ऊर्जा और विकास की समस्याओं पर ध्यान केन्द्रित कर सकता है। इससे भारत को भी लाभ होगा।

आशंकाएं

भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मुद्दे को लेकर होने वाला तनाव इस संगठन की आतंकवाद-विरोधी प्रणाली के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। यह तो तय है कि भारत और पाकिस्तान के इस संगठन में जुड़ने से नए राजनीतिक आयाम तो जुड़ेंगे। चूंकि संगठन में द्विपक्षीय मामलों को उठाए जाने पर प्रतिबंध है, इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि भारत-पाकिस्तान के बीच भी क्षेत्रीय शत्रुता के बजाय परस्पर सहयोग के नए तरीके आजमाए जाएंगे।संभावना है कि उज्बेकिस्तान और कजाकिस्तान के साथ संपर्क स्थापित करके भारत, चाबहार परियोजना के माध्यम से बुनियादी ढांचों की अपनी योजना को यूरेशिया तक पहुंचा सकेगा। लेकिन चीन के रहते ऐसा संभव होना मुश्किल लगता है।

अभी तक सार्क और आर्थिक सहयोग संगठन में पाकिस्तान की भूमिका नकारात्मक रही है। प्रश्न उठता है कि फिर पाकिस्तान को इसकी सदस्यता क्यों दी गई? आशंका जताई जा सकती है कि यह एक चीनी षड़यंत्र है, जिस पर रूस ने अपनी मुहर लगाई है। दरअसल, पाकिस्तान में चीन के सामरिक और आर्थिक हित निहित हैं, जिसे चीन के पाकिस्तान में निवेश, आर्थिक गलियारे और ग्वाद बंदरगाह के साथ एक अन्य सैन्य बंदरगाह की योजना के रुप में देखा जा सकता है। यही नहीं, चीन-पाकिस्तान के सहयोग से ही स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स, सीपेक एवं न्यू मेरीटाइन सिल्क रुट के जरिए भारत को घेरने की रणनीति बना रहा है।

                                                                                                    चीन कि मंशा

स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स

"स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" की बात का जिक्र 2005 में पेंटागन ने ‘एशिया में ऊर्जा का भविष्य’ नाम की एक खुफिया रिपोर्ट में किया था. पेंटागन की इस रिपोर्ट में चीन द्वारा समुद्र में तैयार किए जा रहे "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" का विस्तृत विवरण दिया गया था. ये समुद्र में पाए जाने वाले मोती नहीं बल्कि दक्षिण चीन सागर से लेकर मलक्का संधि, बंगाल की खाड़ी और अरब की खाड़ी तक (यानि पूरे हिंद महासागर में) सामरिक ठिकाने (बंदरगाह, हवाई पट्टी, निगरानी-तंत्र इत्यादि) तैयार करना था. हालांकि रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ये ठिकाने अपने ऊर्जा-स्रोत और तेल से भरे जहाजों के समुद्र में आवागमन की सुरक्षा के लिए तैयार कर रहा है. लेकिन पूरी सच्चाई यह है कि जरुरत पड़ने पर इन सामरिक-ठिकानों को सैन्य-जरुरतों के लिए भी इस्तेमाल कर सकता है

इन खाड़ियों के अलावा "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" प्रोजेक्ट के अंतर्गत पाकिस्तान में ग्वादर और कराची बंदरगाह में मिलिट्री बेस, श्रीलंका में कोलंबो और नये पोर्ट हम्बनटोटा में आर्मी फैसिलिटी के साथ साथ बांग्लादेश के चटगांव में कंटेनर सुविधा बेस और म्यांमार में यांगून बंदरगाह पर मिलिट्री बेस की स्थापना को भी गिना जाता है.

1.      पाकिस्तान: चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) समझौते के अंतर्गत एक मिलिट्री बेस बनाया है. इस बेस के माध्यम से चीन भारत को पश्चिमी मोर्चे पर घेरने की कोशिश कर रहा है.

2.      श्रीलंका: चीन ने श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह से हिंद महासागर में अपनी नौसैनिक गतिविधियों के संचालन की योजना बनाई है. उल्लेखनीय है कि हम्बनटोटा बंदरगाह को विकसित करने के लिए श्रीलंका ने सबसे पहले भारत से ही आग्रह किया था. लेकिन इससे पहले कि भारत तैयार होता, चीन ने श्रीलंका को जरुरी मदद करने की पेशकश कर डाली और अपनी चाल में कामयाब भी हो गया.

3-बांग्लादेश:

चीन ने भारत के एक दूसरे पड़ोसी देश बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह पर अपने लिए एक कंटनेर-पोर्ट तैयार किया है. हाल ही में बांग्लादेश ने अपनी सुरक्षा के लिए चीन से दो पनडुब्बियां खरीदने की घोषणा की है. साथ ही चीन बांग्लादेश से राजनयिक संबध मजबूत करने की लगातार कोशिश कर रहा है और उसको हर तरह की वित्तीय मदद दे रहा है.

4-म्यांमार:

चीन, भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए और भारत के पडोसी देशों की जमीन भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए म्यांमार के साथ सैन्य और आर्थिक संबंधों में वृद्धि कर रहा है. चीन, म्यांमार के एक बंदरगाह यांगून पर भी मिलिट्री बेस बना रहा है.
5- जिबूती में नौसैनिक बेस:

चीन ने अफ़्रीकी देश जिबूती में अपना पहला विदेशी नौसैनिक बेस स्थापित करने के लिए अपना युद्ध पोत जुलाई 2017 में भेजा है. केवल 8 लाख की जनसँख्या वाला जिबूती भारत के दाहिने हाथ पर अरब सागर के किनारे स्थित है. इस जगह पर नैसैनिक अड्डा बनाने के बाद चीन की स्थिति अरब सागर में भी मजबूत हो जाएगी.

6-चीन अपने नौसैनिक बेस हिन्द महासागर में स्थित मालदीव और शेसेल्स में भी स्थापित कर रहा है.

 

सीपेक या वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर)

 

वन बेल्ट, वन रोड परियोजना
1-यह परियोजना 2013  में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा शुरू की गई थी|

2-इसे ‘सिल्क रोड इकॉनमिक बेल्ट’ और 21वीं सदी के समुद्री सिल्क रोड (वन बेल्ट, वन रोड) के रूप में भी जाना जाता है|

3-यह एक विकास रणनीति है जो कनेक्टिविटी पर केंद्रित है| इसके माध्यम से सड़कों, रेल,  बंदरगाह,  पाइपलाइनों और अन्य बुनियादी सुविधाओं को ज़मीन और समुद्र होते हुये एशिया,  यूरोप और अफ्रीका से जोड़ने का विचार है|

4-हालाँकि, इसका एक उद्देश्य यह भी है कि इसके द्वारा चीन अपना वैश्विक स्तर पर प्रभुत्व बनाना चाहता है|

 चीन की मंशा:

1-वन बेल्ट, वन रोड के माध्यम से एशिया के साथ-साथ विश्व पर भी अपना अधिकार कायम करना|

2-दक्षिणी एशिया एवं हिंद महासागर में भारत के प्रभुत्व को कम करना|

3-वस्तुतः इस परियोजना के द्वारा चीन सदस्य देशों के साथ द्विपक्षीय समझोंते करके, उन्हे आर्थिक सहायता एवं ऋण उपलब्ध कराकर उन पर मनमानी शर्तें थोपना चाहता है जिसके फलस्वरूप  वह सदस्य देशों के बाज़ारों में अपना प्रभुत्व बना सके|

4-असल में पिछले काफी सालों से चीन के पास स्टील, सीमेंट, निर्माण साधन इत्यादि की सामग्री का आधिक्य हो गया है| अत: चीन इस परियोजना के माध्यम से इस सामग्री को भी खपाना चाहता है|

व्यापारिक रास्ते पर नियंत्रण :
1- आर्थिक मोर्चे पर, चीनी इस मुक़ाम पर पहुंच गए हैं जहां पश्चिमी देशों के एक बड़े हिस्से ने, चीन द्वारा बनाई गई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था, एशियन इंफ़्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी), में शामिल होने के लिए अमरीका को भी दरकिनार कर दिया है.
2- हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्रों में चीन अमरीका की नाराज़गी मोल लेने को लेकर निश्चिंत नहीं है.इसलिए ओबीओआर चीन को एक वैकल्पिक रूट और बिना विवाद वाला नज़रिया अपनाने की छूट देता है.

3-सबसे अहम यह है कि चीनी समुद्री रास्ते के मुक़ाबले ज़मीनी रास्ते को विकसित करने पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं, जोकि एशिया में पश्चिमी दबदबे को ख़त्म करने के लिए बनाया गया है.
4-वैश्विक व्यापार को नियंत्रित करने के लिए सिर्फ़ मैन्युफ़ैक्चरिंग और वित्त पर ही दबदबा पर्याप्त नहीं है. इसके लिए उन रास्तों पर नियंत्रण करना भी उतना ही अहम है जिनसे होकर व्यापार होता है.

 

 

न्यू मेरीटाइन सिल्क रुट

1- चीन को जाने वाला तेल सबसे पहले पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर या म्यांमार के क्याउकफियू बंदरगाह पर उतरेगा. ये दोनों बंदरगाह चीन ने विकसित किए हैं.

2-इसके बाद यहां से यह तेल टैंकरों, पाइपलाइन या रेल नेटवर्क के मार्फ़त पश्चिमी चीन पहुंचेगा.

3-इस तरह से इस रास्ते में आने वाली उस आबादी के समृद्ध होने की संभावना खुलेगी, जो सदियों से पिछड़ेपन की शिकार है

 

 निष्कर्ष:

 इस संगठन के बारे में अधिक आशंकाएं जताना अति प्रतिक्रिया माना जा सकता है। फिर भी इस संदर्भ में भारत को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। पहला तो यह कि यह संगठन नाटो जैसा ही है। यानी भारत एक सैन्य संगठन का हिस्सा बन रहा है, जो उसकी गुटनिरपेक्ष नीति के विरुद्ध है। दूसरे, जो देश लगातार भारत की सीमा व आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं, उनके प्रति भारत को मर्यादा, मित्रता एवं नैतिकता का प्रदर्शन करना होगा। जिस पाकिस्तान के साथ वह द्विपक्षीय वार्ता करने को भी तैयार नहीं होता, उसके साथ अब उसे बहुपक्षीय वार्ताएं करनी होंगी। इन विरोधाभासों से जूझना भारत के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

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