प्रश्न: 21वी सदीं में कही हमारे देश कि जातिवादी मानसिकता विकास को अवरुद्ध तो नहीं कर रही हैं ?

प्रश्न: 21वी सदीं में कही हमारे देश कि जातिवादी मानसिकता विकास को अवरुद्ध तो नहीं कर रही हैं ?

सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र - 2 : शासन व्यवस्था, संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंध।


दलित उत्पीड़न हो या महिलाओं के साथ भेदभाव, इसका सीधा संबंध विकास से नहीं है। पिछड़े इलाकों में भी भेदभाव कम और विकसित क्षेत्रों में ज्यादा भी हो सकता है। अगर हम हाल में घटी कुछ घटनाओं का विश्लेषण करें तो यह बात प्रमाणिकता से कही जा सकती है। बीते दिनों ही गुजरात में दो घटनाएं हुईं। पहली, गांधीनगर के कालोल तालुका के लिंबोदरा गांव के रहने वाले 24 वर्षीय पीयूष परमार को कथित तौर पर इंग्लिश स्टाइल में मूंछ रखने पर पीटा गया है। दूसरी, गुजरात के ही आणंद जिले के बदरनिया में एक 21 वर्षीय दलित जयेश सोलंकी का कथित तौर पर गरबा डांस देखने जाना पटेल समाज के लोगों को रास नहीं आया और उसे मार-मारकर मौत के घाट उतार दिया गया।

यह बात सर्वविदित है कि देश में गुजरात विकसित राज्यों में से एक है। ऐसे में कहा जा सकता है है कि जो लोग आर्थिक रूप से संपन्न और शिक्षित हैं, वे भी अवसर मिलने पर भेदभाव करने से चूकते नहीं है। एक प्रश्न जो सबसे ज्यादा चिंतित करता है, वह यह है कि क्या जिनके साथ भेदभाव होता है, वही उसका प्रतिरोध करें? क्या ऐसी घटनाएं सिर्फ देश के कमजोर वर्ग को ही प्रभावित करती हैं? क्या इसका संबंध देश के विकास से कुछ भी नहीं है? क्या सरकार द्वारा चलाए गए तमाम अभियान जैसे-स्वच्छ भारत आदि पर इसका प्रतिकूल असर नहीं पड़ता?

यह दावे से कहा जा सकता है कि जो मानसिकता इन्हें पिछड़े और दबे के रूप में देखना चाहती है, वही देश को भी आगे नहीं जाने देना चाहती है। जाहिर है कि यह राष्ट्रीय विषय है न कि केवल सामाजिक न्याय या दबे-कुचले जनप्रतिनिधियों का ही। देश में महिलाओं की आबादी लगभग आधी है और जब तक भेदभाव रहेगा तब तक उनकी भागीदारी शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आर्थिक क्षेत्र में कम ही रहेगी। इसका सीधा असर सभी आर्थिक क्षेत्रों में पड़ेगा, चाहे वह कृषि हो या उत्पादन या सेवा इत्यादि। अर्थशास्त्र का नियम भी कहता है कि यदि समाज के किसी वर्ग की क्रयशक्ति कम होती है तो वस्तुओं की खरीदारी भी कम होती है और उस देश का उत्पादन क्षेत्र ही नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्र जैसे सेवा इत्यादि भी समान रूप से प्रभावित होते हैं।

देश की आजादी के 70 साल हो गए, फिर भी हमारी सरकारें अब तक यह बात नहीं सोच पाई हैं कि जितना शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, परिवहन, जहाजरानी इत्यादि में सुधार और बदलाव की जरूरत है, उतना ही जातिवादी समाज में भी। वास्तव में देश की तरक्की जल, थल, वायु, नदी और समुद्र से ही नहीं होती, बल्कि नागरिक करते हैं। जापान और कोरिया आदि देश ऐसे हैं, जहां पर उपजाऊ जमीन नाम-मात्र की है। समतल जमीन भी नहीं है और लगभग 80 प्रतिशत भूमि कंकरीली, पथरीली और पहाड़ी है। 40 साल पहले दक्षिण कोरिया भी विकास के मामले में हमारे ही साथ था, लेकिन आज वह कई गुना आगे निकल गया है। अगर दक्षिण कोरिया के साथ भारत की तुलना करें तो हम पाते हैं कि साल 2016 में जहां उसकी प्रति व्यक्ति आय 27,539 डॉलर थी जबकि उसकी तुलना में हमारी सिर्फ 1704 डॉलर।

मेरा मानना है कि देश में जातिवादी मानसिकता के लोग अगर यह पढ़ लें तो शायद उनके हृदय में कुछ परिवर्तन हो जाए। इन देशों में क्या मूंछ रखने पर एक नागरिक दूसरे नागरिक को सजा देता है या गरबा देखना जुल्म है? क्या अब भी हम इसे कानून व्यवस्था से जोड़कर देखते रहेंगे? इन घटनाओं से हमारी पढ़ाई-लिखाई पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाता है। हमारे देश में लाखों कॉलेज और स्कूल हैं। हजारों इंजीनियरिंग कॉलेज और सैकड़ों विश्वविद्यालय हैं। तमाम टेलीविजन चैनल और अखबार और उन्हें चलाने वाले हजारों पत्रकार और बुद्धिजीवी हैं। लाखों शिक्षक, लेखक और चिंतक हैं। शिक्षा का दायरा और बुद्धिजीवियों की संख्या भी हमारे यहां इतनी कम नहीं है। मान लिया जाए कि राजनीति नाकाम हुई है, लेकिन बुद्धिजीवी तो और भी असफल रहे हैं। उधर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भी छात्र छेड़खानी और भेदभाव में दूसरों से कम नहीं हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि ये शिक्षक भी छात्रों की मानसिकता को दुरुस्त करने में सफल नहीं हो सके हैं? किसी विषय का ज्ञान रखना और छात्र परीक्षा में पास हो जाए इसका यह मतलब नहीं कि वह शिक्षित है। जितने लोग स्कूल और कॉलेज की शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं, अगर वे यह बात समझ सकते कि अपनी गंदगी को खुद साफ करना है तो अब तक देश बहुत हद तक स्वच्छ हो चुका होता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्वच्छ भारत अभियान चलाने की आवश्यकता न होती।

कथित रूप से स्टाइलिश मूंछ रखने पर प्रताड़ना के विरोध में अब गुजरात के दलित नौजवान ट्विटर और फेसबुक पर पीयूष परमार एवं संविधान के समर्थन में हैशटैग इस्तेमाल कर रहे हैं, यह कहते हुए कि जातिवादी मानसिकता के लोग यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। जाहिर है इससे समाज में कटुता पैदा हो रही है। और जो शक्ति उत्पादन और देश के विकास में लग सकती थी, वह उसके विरोध में खर्च हो रही है। ऐसी घटनाएं जब वृहद रूप लेती हैं तो समाज और बंटता है, अदालतों पर बोझ बढ़ता है और मीडिया में भी उसे जगह देनी पड़ती है। तो अंतत: क्या केवल शोषित वर्ग की ही क्षति होती है? नहीं, इससे भी और बड़ी क्षति होती है, जैसे कि राजनीति का तेजी से ध्रुवीकरण होता है। जहां धुआं है, वहां आग पैदा होगी ही। ऐसे में क्यों न शोषित समाज की जातियां अपनी रक्षा के लिए गोलबंद न हों?

जब ये गोलबंदी होगी तो विकास की बात पर वोट और चुनाव इत्यादि भी नहीं होंगे। इसका सीधा सा अर्थ है कि चुनाव के दौरान प्रचार का पूरा विमर्श ही बदल जाएगा और विकास संबंधी मुद्दे गौण होकर पूरा ध्यान जाति आधारित मसलों पर ही केंद्रित हो जाएगा। सवर्ण और दबंग इसकी चिंता क्यों नहीं करते। शासन-प्रशासन, न्यायपालिका और शिक्षा जगत आदि में इनकी भागीदारी ज्यादा है, लिहाजा यह माना जा सकता है कि ये शिक्षित और जागरूक भी ज्यादा हैं। जो ज्यादा शिक्षित और जाग्रत हैं, उनको ज्यादा देशहित में जिम्मेदार भी होना चाहिए। इसलिए दलित, पिछड़े और महिलाओं से ज्यादा कहीं उन्हें आगे आकर जवाब देना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से अभी तक ऐसा देखा नहीं जा रहा है।

(लेखक डॉ. उदित राज लोकसभा सदस्य हैं)

 

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