प्रश्न 1: आपातकाल(1975) के चार दशक पूरे हो गए। “सबकुछ बदल गया पर नहीं बदली तो इसकी यादें” मूल्यांकन कीजिए. (GS 1)

प्रश्न 1: आपातकाल(1975) के चार दशक पूरे हो गए। “सबकुछ बदल गया पर नहीं बदली तो इसकी यादें” मूल्यांकन कीजिए. (GS 1)

उत्तर की रुपरेखा:

1-उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण 

(1975 AIR 865, 1975 SCR (3) 333)

2- इंदिरा गाँधी का उद्देश्य

3- आपातकाल के पूर्व की स्थितियाँ

4- आपातकाल के पश्चात की स्थितियाँ

5- भारतीय संविधान के तीन तरह के आपातकाल

 

दुनिया का कोई भी इंसान किसी भी तरह की परतंत्रता के बंधन में नहीं रहना चाहता. हर इंसान खुलकर अपने विचार रखने का हिमायती है. इसी तरह हिंदुस्तान की नौजवान पीढ़ी, आज के आज़ादी के माहौल में खुलकर अपने विचार रखती है और ऐसा ही पसंद करती है. साथ ही सरकार की आलोचना भी करती है. लेकिन ज़रा सोचिए, अगर नौजवानों या फिर किसी भी उम्र के लोगों को सोशल मीडिया अर्थात फेसबुक की हर पोस्ट पहले सरकार को भेजनी पड़े और सरकार जो चाहे वही फेसबुक पर दिखे तो क्या होगा? अगर, ट्विटर, व्हाट्सएप के मैसेज पर सेंसर लग जाए, टीवी पर वही दिखे, अखबार में वही छपे, जो सरकार चाहे. यानि बोलने-लिखने-सुनने की आज़ादी पर पाबंदी लग जाए तो क्या होगा?

1-उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण 

(1975 AIR 865, 1975 SCR (3) 333)

यह इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत एक केस था जिसमें भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी पाया गया था। यह केस सन 1975  में राजनारायण द्वारा दायर किया गया था जो चुनाव में इंदिरा गांधी से हार गये थे। न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में श्रीमती गांधी की जीत को अवैध करार दिया और उन्हें 6 वर्ष के लिये चुने हुए पद पर आसीन होने से रोक लगा दी। इस निर्णय से भारत में एक राजनीतिक संकट खड़ा हो गया और इन्दिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी जो 1975 से 1977 तक रहा।

2-इंदिरा गाँधी का उद्देश्य

(a)इंदिरा गाँधी का यह उद्देश्य था कि आपातकाल से अपनी कुर्सी बचाने के साथ-साथ ढुलमुल प्रशासन को चाक-चौबंद किया जाए।

(b)इमर्जेंसी के दौरान सरकारी मशीनरी में सुधार हुआ।

(c)कर्मचारी समय पर आने-जाने लगे और रिश्वतखोरी की घटनाएँ काफ़ी कम हो गईं.

3-आपातकाल के पूर्व की स्थितियाँ

(a)इंदिरा गाँधी कल्याणकारी नीतियों के कारण निम्न वर्ग को फ़ायदा हो रहा था लेकिन पूँजीपतियों को सरकारी नीतियों से घोर निराशा हो रही थी। इसी प्रकार जिन राजे-रजवाड़ों के विरुद्ध कार्रवाई की गई थी, वे भी वर्ग सरकार की नीतियों का समर्थक नहीं रहा क्योंकि कीमतों में काफ़ी वृद्धि हो रही थी और लोग बढ़ती महँगाई के कारण जीवन स्तर बनाए रखने में सफल नहीं हो पा रहे थे।

(b)देश ने युद्ध का आर्थिक बोझ भी झेला था। एक करोड़ बांग्लादेश शरणार्थियों को शरण देने के कारण संकट तब बढ़ गया जब दो वर्षों से वर्षा नहीं हुई।

(c)अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पेट्रोलियम के मूल्य में निरंतर वृद्धि होने से भी भारत में महँगाई बढ़ रही थी और देश का विदेशी मुद्रा भंडार पेट्रोलियम आयात करने के कारण तेजी से घटता जा रहा था। आर्थिक मंदी से उद्योग धंधे भी चौपट हो रहे थे। ऐसी स्थिति में बेरोज़गारी काफ़ी बढ़ चुकी थी

 (d)सरकारी कर्मचारी महँगाई से त्रस्त होने के कारण वेतन में वृद्धि की माँग कर रहे थे। सरकारी कर्मियों के रूप में सबसे बड़ी हड़ताल रेल कर्मचारियों की थी। इनका आंदोलन 22 दिनों तक चला। इस कारण जहाँ यात्रियों को भारी परेशानी हुई, वहीं माल का परिवहन भी बाधित हुआ।रेल का चक्का रुकने से देश की प्रगति का चक्र भी थम गया था। रेल कर्मचारियों को चेतावनी दी गई लेकिन हड़ताल जारी रही। ऐसे में सरकार ने हड़ताल को गैरक़ानूनी क़रार देते हुए कठोर और दमनात्मक कार्रवाई की। हज़ारों कर्मचारियों के आवास ख़ाली करवाए गए और उन्हें नौकरी से भी बर्खास्त कर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि कर्मचारी एवं श्रमिक वर्ग इंदिरा गाँधी से नाराज़ हो गया।

(c)सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप भी लगने लगे। सरकार के ख़िलाफ़ देश भर में आंदोलन किए जा रहें थे। उधर इंदिरा गाँधी अपने छोटे पुत्र संजय गाँधी को राजनीति में ले आई थीं। युवा संजय गाँधी ने असंवैधानिक ढंग से सरकार चलाने का कार्य आरंभ कर दिया। संजय गाँधी के प्रति इंदिरा गाँधी की वैसी ही निष्ठा थी जैसी धृतराष्ट्र की दुर्योधन के प्रति थी। पुत्र मोह के कारण इंदिरा गाँधी ने संजय को 50,000 मारुति कार निर्माण का लाइसेंस भी प्रदान कर दिया।

4- आपातकाल के पश्चात की स्थितियाँ

(a)गुजरात आंदोलन

सर्वप्रथम विरोधी राजनीति और असंतोष से उत्पन्न हिंसक आंदोलन का सूत्रपात  गुजरात से हुआ जो बेहद शांतिप्रिय राज्य माना जाता था। यहाँ छात्रों ने हिंसक आंदोलन किए और विपक्ष ने भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1974 में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई। इंदिरा गाँधी ने राज्य सरकार को बर्खास्त करके वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा दिया।  जून, 1976 में चुनाव करवाए जाने की घोषणा भी कर दी गई। इस प्रकार आंदोलनों के कारण गुजरात में निर्वाचित सरकार को भंग करना पड़ा। इससे दूसरे राज्यों तक भी ग़लत संदेश गया और इसकी प्रतिक्रिया बिहार में हुई।

(b) बिहार आंदोलन

बिहार में भी आंदोलन का सूत्रपात छात्र आंदोलन के रूप में हुआ। मार्च, 1974 में छात्रों ने बिहार विधानसभा का घेराव किया। इस आंदोलन में विपक्षी दलों ने छात्रों का साथ देना शुरू कर दिया।जयप्रकाश नारायण जो राजनीति से सन्न्यास ले चुके थे, वह सक्रिय हो गए और उन्होंने आंदोलन की कमान संभाल ली। जिस प्रकार अंग्रेज़ों के विरुद्ध असहयोग आंदोलन चलाया गया था, उसी तर्ज पर जयप्रकाश नारायण ने लोगों को उकसाया कि राज्य की व्यवस्था चौपट कर दी। लेकिन इंदिरा जी ने गुजरात वाली ग़लती को बिहार में नहीं दोहराया।

(c)सम्पूर्ण क्रान्ति(पांच जून, 1974)

 जयप्रकाश नारायण का विचार व नारा था जिसका आह्वान उन्होने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेकने के लिये किया था।

लोकनायक नें कहा कि सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियाँ शामिल है - राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रान्ति होती है।

(d)आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (Maintenance of Internal Security Act (MISA))

सन 1971 में भारतीय संसद द्वारा पारित एक विवादास्पद कानून था। इसमें कानून व्यवस्था बनाये रखने वाली संस्थाओं को बहुत अधिक अधिकार दे दिये गये थे। आपातकाल के दौरान (1975-1977) इसमें कई संशोधन हुए और बहुत से राजनीतिक बन्दियों पर इसे लगाया गया। अन्ततः 1977 में इंदिरा गांधी की पराजय के बाद आयी जनता पार्टी की सरकार द्वारा इसे समाप्त किया गया।

(e)शाह आयोग 

भारत सरकार द्वारा 28 मई 1977 में नियुक्त एक जाँच आयोग था। यह आपातकाल (1975-77) के समय की गयी ज्यादतियों की जाँच के लिये बनाया गया था। भारत के भूतपूर्व मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति जे सी शाह इसके अध्यक्ष थे।

 (f) जनता पार्टी की सत्ता

देश की जनता ने आपातकाल की ज्यादतियों के विरोध में इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ मतदान किया। जनता को भी यह उम्मीद थी कि परिवर्तन से सुधार अवश्य आएगा। उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी। लेकिन भारतीय जनता ने उस समय यह आकलन नहीं किया था कि जनता पार्टी में जिन दलों के लोग हैं, वे भिन्न नीतियों और विचारों से पोषित रहे हैं। इस कारण सैद्धांतिक रूप से उनमें मतभेद हैं। जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 542 में से 330 सीटें प्राप्त हुईं। इंदिरा गाँधी की पार्टी मात्र 154 स्थानों पर ही विजय प्राप्त कर सकी। उस समय प्रधानमंत्री पद के तीन प्रबल दावेदार सामने आए थे-चौधरी चरण सिंह,मोरारजी देसाई  और जगजीवन राम।जयप्रकाश नारायण की सहमति से 23 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनाए गए।

(g) काँग्रेस-इं (इं से इंदिरा) पार्टी

कांग्रेस को एक अन्य विभाजन की त्रासदी भी भोगनी पड़ी। ब्रह्मानंद रेड्डी और वाई.वी. चौहान ने अपने खेमे के साथ इंदिरा गाँधी से किनारा कर लिया। उन्हें लगा कि इंदिरा गाँधी का करिश्मा समाप्त हो चुका है। कांग्रेस पार्टी में उनका कोई विशिष्ट स्थान नहीं रह गया है। 1978 के आरम्भ में श्रीमती गाँधी के समर्थक कांग्रेस पार्टी से अलग हो गए और कांग्रेस-आई या काँग्रेस-इं (इं से इंदिरा) पार्टी की स्थापना की।

                                                                      भारतीय संविधान में वर्णित तीन आपातकाल

 

1. राष्ट्रीय आपात - अनुच्छेद 352

 

राष्ट्रीय आपात की घोषणा काफ़ी विकट स्थिति में होती है. इसकी घोषणा युद्ध, बाह्य आक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर की जाती है. आपातकाल के दौरान सरकार के पास तो असीमित अधिकार हो जाते हैं, जिसका प्रयोग वह किसी भी रूप में कर सकती है, लेकिन आम नागरिकों के सारे अधिकार छीन लिए जाते हैं. राष्ट्रीय आपात को मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा लागू किया जाता है.

इस आपातकाल के दौरान संविधान में वर्णित  मौलिक अधिकार का अनुच्छेद 19 स्वत: निलंबित हो जाता है. लेकिन इस दौरान अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 अस्तित्व में बने रहते हैं.

 

2. राष्ट्रपति शासन अथवा राज्य में आपात स्थिति- अनुच्छेद 356

 

इस अनुच्छेद के अधीन राज्य में राजनीतिक संकट के मद्देनज़र, राष्ट्रपति महोदय संबंधित राज्य में आपात स्थिति की घोषणा कर सकते हैं. जब किसी राज्य की राजनैतिक और संवैधानिक व्यवस्था विफल हो जाती है अथवा राज्य, केंद्र की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन करने में असमर्थ हो जाता है, तो इस स्थिति में ही राष्ट्रपति शासन लागू होता है. इस स्थिति में राज्य के सिर्फ़ न्यायिक कार्यों को छोड़कर केंद्र सारे राज्य प्रशासन अधिकार अपने हाथों में ले लेती है. कुछ संशोधनों के साथ इसकी अवधि न्यूनतम 2 माह और अधिकतम 3 साल तक हो सकती है. अकसर जब राज्य सरकारें संविधान के अनुरूप सरकार चलाने में विफल हो जाती हैं, तो केंद्र की अनुशंसा पर राष्ट्रपति द्वारा आपात घोषित कर दिया जाता है.

3. वित्तीय आपात - अनुच्छेद 360

 

वित्तीय आपातकाल भारत में अब तक लागू नहीं हुआ है. लेकिन संविधान में इसको अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है. अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपात की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब राष्ट्रपति को पूर्ण रूप से विश्वास हो जाए कि देश में ऐसा आर्थिक संकट बना हुआ है, जिसके कारण भारत के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है. अगर देश में कभी आर्थिक संकट जैसे विषम हालात पैदा होते हैं, सरकार दिवालिया होने के कगार पर आ जाती है, भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त होने की कगार पर आ जाए, तब इस वित्तीय आपात के अनुच्छेद का प्रयोग किया जा सकता है. इस आपात में आम नागरिकों के पैसों एवं संपत्ति पर भी देश का अधिकार हो जाएगा. राष्ट्रपति किसी कर्मचारी के वेतन को भी कम कर सकता है.

गौरतलब है कि संविधान में वर्णित तीनों आपात उपबंधों में से वित्तीय आपात को छोड़ कर भारत में बाकी दोनों को आजमाया जा चुका है. भारत में कभी वित्तीय आपात लागू न हो, इसकी हमें प्रार्थना करनी चाहिए. आपातकाल का सीधा सा मतलब होता है, आम नागरिकों के सारे मौलिक अधिकारों का ह्रास. इस दौरान आम नागरिकों की हालत ऐसी हो जाती है, जैसे उन पर कोई निरंकुश शासक राज कर रहा हो.

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