1-लोकपाल अधिनियम, 2013 के अधीन लोकपाल की अधिकारिता का वर्णन करें। क्या इन्हें प्रदत्त शक्तियाँ भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में सक्षम हैं? (GS I AND IV )

1-लोकपाल अधिनियम, 2013 के अधीन लोकपाल की अधिकारिता का वर्णन करें। क्या इन्हें प्रदत्त शक्तियाँ भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में सक्षम हैं (GS II AND IV )

उत्तर की रुपरेखा:

1-लोकपाल की सेवा शर्तें और नियुक्ति

2-कौन होगा लोकपाल में

3-कौन नहीं होगा लोकपाल में

4-चयन समिति

5-लोकपाल का अधिकार क्षेत्रः

 

 

भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक-2013 पर 1 जनवरी 2014 को हस्ताक्षर किया. इसके साथ ही यह विधेयक अब अधिनियम बन गया है. यह अधिनियम एक भ्रष्टाचार विरोधी निगरानी समिति बनाने की अनुमति देता है जिसमें कुछ सुरक्षा उपायों के साथ प्रधानमंत्री का पद भी इस दायरे में आ जाएगा I इससे पहले 17 दिसंबर 2013 को संशोधित विधेयक राज्य सभा द्वारा पारित किया जा चुका था I

                    कौन होगा लोकपाल में

                    कौन नहीं हो सकता

• लोकपाल का एक अध्यक्ष होगा जो या तो भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश या फिर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज या फिर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति हो सकते हैं I

• लोकपाल में अधिकतम आठ सदस्य हो सकते हैं, जिनमें से आधे न्यायिक पृष्ठभूमि से होने चाहिए I

• इसके अलावा कम से कम आधे सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यकों और महिलाओं में से होने चाहिएI

 

•संसद सदस्य या किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा का सदस्य

• ऐसा व्यक्ति जिसे किसी किस्म के नैतिक भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया हो

• ऐसा व्यक्ति जिसकी उम्र अध्यक्ष या सदस्य का पद ग्रहण करने तक 45 साल न हुई हो

• किसी पंचायत या निगम का सदस्य

 

• ऐसा व्यक्ति जिसे राज्य या केंद्र सरकार की नौकरी से बर्ख़ास्त या हटाया गया हो

 

 

चयन समिति:-

  • प्रधानमंत्री- अध्यक्ष
  • लोकसभा के अध्यक्ष- सदस्य
  • लोकसभा में विपक्ष के नेता- सदस्य
  • मुख्य न्यायाधीश या उनकी अनुशंसा पर नामित सुप्रीम कोर्ट के एक जज- सदस्य
  • राष्ट्रपति द्वारा नामित कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति- सदस्य

टिपण्णी: अध्यक्ष या किसी सदस्य की नियुक्ति इसलिए अवैध नहीं होगी क्योंकि चयन समिति में कोई पद रिक्त था I

                                                                   लोकपाल का अधिकार क्षेत्रः

 

लोकपाल कुशासन, अनुचित लाभ पहुंचाने या भ्रष्टाचार से संबंधित मामले जो किसी मंत्री या केंद्र या राज्य सरकार के सचिव के अनुमोदन से की गई प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ में पीड़ित व्यक्ति द्वारा लिखित शिकायत किए जाने पर या स्वतः संज्ञान लेते हुए, जांच कर सकता है। लेकिन लोकपाल पीड़ित व्यक्ति को अदालत या वैधानिक न्यायाधिकरण से मिली किसी भी फैसले के संबंध में किसी प्रकार की जांच नहीं कर सकता है।

 

                                                               लोकायुक्त के कार्य –

 

(1) कुशासन की वजह से न्याय और परेशानी संबंधी नागरिकों की 'शिकायतों' की जांच। 

(2) सरकारी कर्मचारी के खिलाफ पद का दुरुपयोग, भ्रष्टाचार या ईमानदारी में कमी के आरोपों की जांच करना। शिकायतों और भ्रष्टाचार उन्मूलन के संबंध में इस प्रकार के अतिरिक्त कार्य की जानकारी राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट अधिसूचना से दी जा सकती है।

 

                                           अतिरिक्त कार्यों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं–

 

क) भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों, अधिकारियों और प्रस्तावों की जांच का पर्यवेक्षण।

 

ख) "यद्यपि" अधिनियम में उल्लिखित नहीं होते हुए भी उसमें निहित, राज्यपाल को जरूरत हो तो आदेश द्वारा किसी भी कार्रवाई की जांच करना। 

राज्यपाल के अधिनियम के तहत लोकायुक्त और उपलोकायुक्त को उनके कार्यों के प्रदर्शन पर वार्षिक समेकित रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। प्रो. एस.एन. हेगड़े बनाम लोकायुक्त, बैंगलोर और अन्य के मामले में, बैंगलोर लोकायुक्त अधिनियम के तहत लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र के बारे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया। इस मामले में, अगर लोकायुक्त को मुख्यमंत्री, मंत्री या सचिव या राज्य विधायिका के सदस्य के अलावा किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ की गई शिकायत पर गौर करना और उसकी जांच करना हो तो बिना राज्य सरकार की अधिसूचना के वह अपना काम शुरु नहीं कर सकता। अधिनियम के प्रावधानों के तहत लोकायुक्त के पास उप–कुलपति के खिलाफ की गई शिकायत की जांच करने का भी अधिकार नहीं है। ऐसे अधिकार पर विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 14 के तहत स्पष्ट रूप से रोक लगा दी गई है इसलिए लोकायुक्त के पास अधिसूचना के तहत उनके खिलाफ शिकायतों की जांच करने का अधिकार नहीं है।

 

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम-2013 के मुख्य प्रावधान:

(1) अधिनियम के अनुसार लोकपाल केंद्र स्तर का और लोकायुक्त राज्य स्तर पर होगा ।

(2) लोकपाल में एक अध्यक्ष के साथ अधिकतम आठ सदस्य हो सकते हैं जिनमें से 50फीसदी सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि से होने चाहिए ।

(3) अधिनियम के मुताबिक लोकपाल के कुल सदस्यों में से 50फीसदी सदस्य अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति/ अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों और महिलाओं में से होने चाहिए ।

(5) प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया गया है ।

(6) लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में लोक सेवक की सभी श्रेणियां होंगी ।

(7) इसके दायरे में विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) के संदर्भ में वे कोई/सभी संस्थाएं होंगी जो विदेशी स्रोतों से 10 लाख रुपये से ज्यादा का दान लेगीं।

(8) अधिनियम के तहत ईमानदार और सीधे–साधे लोक सेवकों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाएगी ।

(9) अधिनियम लोकपाल को अधीक्षण का अधिकार और विभिन्न मामलों में सीबीआई समेत किसी भी जांच एजेंसी को निर्देशित करने का –चाहे वह लोकपाल ने खुद जांच एजेंसी को ही क्यों न दिया हो, अधिकार प्रदान करता।

(10) सीबीआई के निदेशक की सिफारिश उच्च शक्ति समिति द्वारा भारत के प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में की जाएगी।

(11) अभियोजन के निदेशक के नेतृत्व में अभियोजन निदेशालय को निदेशक नियंत्रित करेंगे।

(12) केंद्रीय सतर्कता आयोग अभियोजन निदेशक, सीबीआई की नियुक्ति की सिफारिश करेंगें।

(13) लोकपाल द्वारा संदर्भित मामलों की जांच कर रहे सीबीआई अधिकारियों के तबादले के लिए लोकपाल की मंजूरी की जरूरत होगी ।

(14) अधिनियम में भ्रष्ट तरीकों से अर्जित की गई संपत्ति को जब्त करने का भी प्रावधान है चाहे अभियोजन का मामला लंबित ही क्यों न हो।

(15) अधिनियम में प्रारंभिक जांच और ट्रायल के लिए स्पष्ट समय सीमा निर्धारित की गई है। ट्रायल के लिए विशेष अदालतों की स्थापना का भी उल्लेख है।

(16) इसमें अधिनियम के लागू होने के 365 दिनों के भीतर राज्य विधानमंडल द्वारा कानून के अधिनियमन के जरिए लोकायुक्त संस्था की स्थापना का उल्लेख भी किया गया है ।

इस अधिनियम के वर्ष 2014 में लागू हो जाने के बावजूद आज तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है। लोकपाल के अभाव में यह अधिनियम क्रियान्वित नहीं हो पा रहा है। एक गैर-सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ ने सर्वोच्च न्यायालय में पिटीशन लगाई कि सरकार जानबूझकर लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर रही है। नवम्बर, 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि लोकपाल कानून को एक ‘मृत पत्र (dead letter)’ नहीं बनने दिया जा सकता।

लोकपाल की नियुक्ति न हो पाने के संदर्भ में सरकार का अपना एक तर्क है। सरकार अनुसार लोकपाल के चुनाव के लिए जो चयन-समिति होती है, उसमें एक सदस्य ‘लोकसभा में विपक्ष का नेता’ होता है। परंतु 16वीं लोकसभा में किसी भी विपक्षी पार्टी के पास कुल लोकसभा सदस्यों की 10 प्रतिशत या अधिक सदस्य संख्या नहीं हैं, जो किसी पार्टी के नेता को ‘विपक्ष का नेता’ का दर्जा दिलाने की पूर्व शर्त होती है।

अतः बिना ‘विपक्ष के नेता’ के सरकार लोकपाल का चुनाव कैसे करे? अब सरकार अधिनियम में ‘विपक्ष के नेता’ की परिभाषा में संशोधन का प्रस्ताव लाई है जो अभी संसद में पारित नहीं हो पाया है, जिसके अनुसार विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता को ‘विपक्ष के नेता’ मान लिया जाएगा।

मेरे विचार से सरकार को शीघ्रता से यह संशोधन पारित करवाना चाहिए ताकि एक सक्षम और सशक्त लोकपाल की 

प्रणाली शुरू हो क्योंकि वर्तमान सरकार भ्रष्टाचार का विरोध तथा पारदर्शिता लाने का आह्वान करते हुए सत्ता में आई थी। अब अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने तथा भ्रष्टाचार पर अकुंश लगाने के लिए लोकपाल की नियुक्ति शीघ्रातिशीघ्र करना समय की मांग है।

 

 

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